यहाँ अमेरिका में पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल दूर स्थित ऑफिस जाने के लिए लोग कम ही करते है । एक साल से ज्यादा पार्ट टाइम काम करने के बाद जब फुल टाइम नौकरी मिली तो कई लोगों ने कहा की गाडी खरीद लो , मन भी किया मगर किसी न किसी कारण से नहीं खरीदा ।
बस में सफ़र करने के कई फायदे थे, एक तो ये की बस से सफ़र करना काफी सस्ता था और उसके अलावा पैर पसार के सुस्ताने, ऊँघने, कुछ सोचने या फिर तस्सली से गाना सुन्ने के लिए कुछ समय मिल जाता था। ऑफिस से आने-जाने का सफ़र करते करते एक नयी आदत लग गयी .. रविश के पुराने ब्लॉग को पड़ने की, जिसको मैंने 2007 से नहीं पढ़ रहा था - जब से रविश ने ब्लॉग लिखना शुरू किया था।
बस में इन्टरनेट नहीं था। अब आलम यह था की शाम 4:20 की बस के लिए 3 बजे से ही रविश के पुराने ब्लॉग का लिंक लैपटॉप में खोलने लग जाता था। इस रोमांच के साथ की पैंतालिस मिनट के सफ़र में कम से कम से दस ब्लॉग तो पड़ ही लूँगा । खैर जो भी कहिये, सिलसिला बदस्तूर जारी था।
हर रोज की तरह आज भी ऑफिस से निकलते हुए वही उत्सुकता थी। 10 -12 ब्लॉग के लिंक खुले हुए थे लैपटॉप में। जब बचपन में स्कुल के छुट्टी होती थी तो बस के झंगले के पास बैठने का रोमांच कुछ अलग ही होता था, कुछ वैसा ही अनुभव हो रहा था। इस बार तो हैडफ़ोन में मालिनी अवस्थीजी के गाने, और लैपटॉप पे रविश का लेखन की मौजूदगी आनंद को कुछ दुगुना सा कर रहे थे ।
जल्द ही Z9 नंबर की बस आ गयी। लफंगा टाइप फान कर बस में चढ़ा और आखिरी कतार के झंगले वाली सीट को हड़प लिया। पहला ही ब्लॉग "बाबा की खीर" थी | जैसे मछली पानी में पहुंचकर कल्लोल करती है, कुछ वैसा ही आभास हो रहा था । पड़ते पड़ते गला रुंध गया। मन ही मन रविश को धन्यवाद दे रहा था सामाजिक जदोजहद और लोगो के निश्वार्थ प्यार से रूबरू कराने के लिए। दिख रहा था की लोग कितना चाहते थे रविश को।
जब तक ब्लॉग ख़तम हुआ, आंसुओं के धार दोनों आँखों से अकस्मात ही बह रही थी। मैं भी हतप्रभ था। ब्लॉग के साथ साथ कमेंट भी जरूर पडता था। राजीव रंजन के कमेंट पर नज़र गयी। राजीव की सीधी सपाट बात दिल को छु गयी। मन किया की अभी भाग के राजीव के गुडगाँव वाले ऑफिस में जाऊं और उसको गले लगा लूँ .. अपने पिताजी की बात मानने के लिए, रविश की रिपोर्ट देखने के लिए, रविश की उस ब्लॉग पर कमेंट करने के लिए।
ब्लॉग की ख्यालों में घूम था तभी एहसास हुआ की घर का स्टॉप आने ही वाला है। लजाते हुए आँख मीच रहा था ताकि लोगों को लगे इमोशनल आंसू नहीं हैं, खुजली वाले हैं। भावनाओ को छिपाने की आदत बचपन से थी। घर के तरफ जाते हुए आँखों के सामने सावाँ का खीर वाले बाबा, जमालुद्दीन मोहम्मद, राजीव के पिता और राजीव नज़र आ रहे थे। शाम सुहावनी लग रही थी और मैं मंद मंद मुस्कुरा रहा था।
नोट: रविश के बाबा की खीर ब्लॉग का लिंक निचे हैं
http://naisadak.blogspot.com/2013/06/blog-post_11.html
बस में सफ़र करने के कई फायदे थे, एक तो ये की बस से सफ़र करना काफी सस्ता था और उसके अलावा पैर पसार के सुस्ताने, ऊँघने, कुछ सोचने या फिर तस्सली से गाना सुन्ने के लिए कुछ समय मिल जाता था। ऑफिस से आने-जाने का सफ़र करते करते एक नयी आदत लग गयी .. रविश के पुराने ब्लॉग को पड़ने की, जिसको मैंने 2007 से नहीं पढ़ रहा था - जब से रविश ने ब्लॉग लिखना शुरू किया था।
बस में इन्टरनेट नहीं था। अब आलम यह था की शाम 4:20 की बस के लिए 3 बजे से ही रविश के पुराने ब्लॉग का लिंक लैपटॉप में खोलने लग जाता था। इस रोमांच के साथ की पैंतालिस मिनट के सफ़र में कम से कम से दस ब्लॉग तो पड़ ही लूँगा । खैर जो भी कहिये, सिलसिला बदस्तूर जारी था।
हर रोज की तरह आज भी ऑफिस से निकलते हुए वही उत्सुकता थी। 10 -12 ब्लॉग के लिंक खुले हुए थे लैपटॉप में। जब बचपन में स्कुल के छुट्टी होती थी तो बस के झंगले के पास बैठने का रोमांच कुछ अलग ही होता था, कुछ वैसा ही अनुभव हो रहा था। इस बार तो हैडफ़ोन में मालिनी अवस्थीजी के गाने, और लैपटॉप पे रविश का लेखन की मौजूदगी आनंद को कुछ दुगुना सा कर रहे थे ।
जल्द ही Z9 नंबर की बस आ गयी। लफंगा टाइप फान कर बस में चढ़ा और आखिरी कतार के झंगले वाली सीट को हड़प लिया। पहला ही ब्लॉग "बाबा की खीर" थी | जैसे मछली पानी में पहुंचकर कल्लोल करती है, कुछ वैसा ही आभास हो रहा था । पड़ते पड़ते गला रुंध गया। मन ही मन रविश को धन्यवाद दे रहा था सामाजिक जदोजहद और लोगो के निश्वार्थ प्यार से रूबरू कराने के लिए। दिख रहा था की लोग कितना चाहते थे रविश को।
जब तक ब्लॉग ख़तम हुआ, आंसुओं के धार दोनों आँखों से अकस्मात ही बह रही थी। मैं भी हतप्रभ था। ब्लॉग के साथ साथ कमेंट भी जरूर पडता था। राजीव रंजन के कमेंट पर नज़र गयी। राजीव की सीधी सपाट बात दिल को छु गयी। मन किया की अभी भाग के राजीव के गुडगाँव वाले ऑफिस में जाऊं और उसको गले लगा लूँ .. अपने पिताजी की बात मानने के लिए, रविश की रिपोर्ट देखने के लिए, रविश की उस ब्लॉग पर कमेंट करने के लिए।
ब्लॉग की ख्यालों में घूम था तभी एहसास हुआ की घर का स्टॉप आने ही वाला है। लजाते हुए आँख मीच रहा था ताकि लोगों को लगे इमोशनल आंसू नहीं हैं, खुजली वाले हैं। भावनाओ को छिपाने की आदत बचपन से थी। घर के तरफ जाते हुए आँखों के सामने सावाँ का खीर वाले बाबा, जमालुद्दीन मोहम्मद, राजीव के पिता और राजीव नज़र आ रहे थे। शाम सुहावनी लग रही थी और मैं मंद मंद मुस्कुरा रहा था।
नोट: रविश के बाबा की खीर ब्लॉग का लिंक निचे हैं
http://naisadak.blogspot.com/2013/06/blog-post_11.html
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