राज्यसभा के सांसद मोहम्मद अदीब के
पहल पर अमरिकी सरकार को भेजे गए उस पत्र पर काफी बवाल हो रहा है जिसमें
अमरिकी सरकार को गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को अमरिका भ्रमण के
लिए वीसा न देने की दरख्वास्त की गयी है। दो बार भेजे गए इस ६४ सांसदों के
हस्ताक्षर वाले गुजारिशनामे के मीडिया में ज़ाहिर होते ही कई सांसदों ने
अपने हस्ताक्षर के फर्जी होने का संदेह व्यक्त किया। बयान आया की मामला
हस्ताक्षर के कॉपी और पेस्ट का है। कई सांसदों ने यह भी कहा की उन्हें याद
ही नहीं की उन्होंने कभी इस तरह के किसी पत्र पर पर दस्तखत किया है।
कुछ वरीय पत्रकारों एवं नेताओं नें नरेन्द्र मोदी के साम्प्रदायिकता को भारत का अंदरूनी मसला करार देते हुए इस तरह के पहल की भर्त्सना की। यह बात सही भी है की स्वायत भारत के सांसदों को भारत के ही एक मुख्यमंत्री को अमरिकी नैतिकता के कटघरे में खड़े करने की क्या ज़रुरत है। खासकर जब उस मुख्यमंत्री के ऊपर खुद भारत के न्यायालयों में अभी तक इस मामले पर कोई आरोप दाखिल नहीं हुआ हैं। अमरिकी नागरीक और विश्विख्यात विचारक नोआम चौमस्की अमरिका को दुनिया का सबसे बड़ा आतंकी और नरसंहारी देश करार देते हैं। वह कहते हैं की अमरिका एक ज़माने से दुसरे देश के नागरिको का नरसंहार करता रहा है और यह अभी भी बदस्तूर ज़ारी है। हालांकि चौमस्की किसी अंतरराष्ट्रीय नरसंहार न्यायलय के न्यायधीश नहीं है मगर अमरिका के वर्षों के सुदृड़ नरसंहारी रिकॉर्ड पर किसे शक हो सकता है। फिर यह कहाँ तक जायज़ है की एक जन्मजात नरसंहारी देश किसी दुसरे देश के राजनयिक की सांप्रदायिक नरसंहारीता में संग्लिप्त होने की सम्भावना के ऊपर अंपायरिंग करे।
यह हो सकता है की मोदीजी लोकसभा चुनाव से पहले अपने सैधांतिक गुरु अमरिका के पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज डब्लू बुश से दीक्षा ग्रहण के लिए अमरिका जाना चाहते हों। कई पहलुओं पर रिपब्लिकन पार्टी की अनुयायी रही भाजपा के लिए कुछ पश्चिमी समर्थक जुटाना चाहते हों या फिर अपने कार्यकाल के दौरान अमरिकी मॉडल पर हो रहे गुजरात के विकास के लिए तगमा लेना चाहते हों। कारण चाहे जो भी हो, बार बार दुत्कारे जाने के बाद भी मोदीजी की अमरिका जाने की उत्सुकता थोड़ी निराशाजनक प्रतित होती है।
जहाँ एक ओर मीडिया ने अदीब साहब के पहल के ऊपर कुछ सवाल उठाए तो वहीँ राजनितिक दलों नें इस मुद्दे से काफी हद तक कन्नी काट लीया। एक ओर कांग्रेस का कोई तार्किक बयान नहीं आया तो दूसरी ओर भाजपा ने राजनाथ सिंह को मोदीजी के "वीसानामो" के लिए अमरिका रवाना कर दिया और उनके वापसी तक के लिए हिन्दू राष्ट्रवाद की गाथा भुलाकर सिर्फ सांसदों के खिलाफ शिकायत दर्ज करना ही उचित समझा। कम्युनिस्ट पार्टी कॉपी और पेस्ट के दलील के साथ झेपती हुइ नज़र आई तो वहीं बिहारी अस्मिता की बात करने वाले नितीश कुमार ने राष्ट्रीय अस्मिता और जद(यू) सांसद साबिर अली के हस्ताक्षर के बारे में कुछ नहीं कहा।
इस वाद-विवाद में सांसदों के यादाश्त और उनके माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस के हुनरता के अवलोकन करने के अलावा कुछ अहम् सवाल भी किसी अनसुलझे गुत्थी की तरह रह गए जिस पर किसी ने चर्चा नहीं की। मसलन अदीब साहब और कई अन्य सांसदों के लिए अमरिका मानवाधिकार के पालन का मापदंड क्यों बन गया है, वो भी तब जब अमरिका का मानवाधिकार उल्लंघनो के मामलों में विश्व में कोई सानी नहीं है। क्यों हमारे राज्यतंत्र के नुमाइन्दो के लिए अमरिकी सरकार का मोदीजी को वीसा न देने का निर्णय एक तरह के सजा का प्रारूप है और सबसे महत्वपूर्ण यह की भाजपा और कांग्रेस दोनों को यह क्यों लगता है की उनके मोक्ष प्राप्ति के लिए भारत के सामाजिक और आर्थिक नीतियों का व्यापक अमरिकरण ज़रूरी है ?
इसमें कोई शक नहीं की अदीब साहब के मन में अमरिका को सांसारिक न्यायाधीश के रूप में देखने की चाहत हमारे ही समाज की देन हैं जहाँ हम बात-बात में अमरिका को पानी चढ़ाते रहते हैं। चाहे बात बेबाक बयान देने वाले विकास पुरुष मनमोहन सिंह की हो या फिर हँसी-ख़ुशी महंगाई का बोझ उठाए घूमते आम आदमी की, शायद सब समझने लगे हैं की अमरिका ही हमारा पालनहार है। टीवी चैंनलों पर किसी भी मुद्ददे पर हो रहे बहस को देख लीजिये, गाहे बगाहे अमरिका का जिक्र हो ही जाता है और हमारे बहुउपयोगी विशेषज्ञ अमरिकी निति को विश्वस्तरिय मापदंड कहने से कभी नहीं हिचकिचाते, भले ही कुछ अन्य देश उन मसलों पर अमरिका से कहीं ज्यादा बेहतर हों। लगता है की भारत में तबातोर बिकते अमरिका पुराण का अब कोई ओर-अंत नहीं रह गया है और मोदीजी के लिए तो अभी 3D प्रोजेक्शन ही सहारा है।
शाश्वत गौतम
२९ जुलाई, २०१३
वाशिंगटन डी.सी
कुछ वरीय पत्रकारों एवं नेताओं नें नरेन्द्र मोदी के साम्प्रदायिकता को भारत का अंदरूनी मसला करार देते हुए इस तरह के पहल की भर्त्सना की। यह बात सही भी है की स्वायत भारत के सांसदों को भारत के ही एक मुख्यमंत्री को अमरिकी नैतिकता के कटघरे में खड़े करने की क्या ज़रुरत है। खासकर जब उस मुख्यमंत्री के ऊपर खुद भारत के न्यायालयों में अभी तक इस मामले पर कोई आरोप दाखिल नहीं हुआ हैं। अमरिकी नागरीक और विश्विख्यात विचारक नोआम चौमस्की अमरिका को दुनिया का सबसे बड़ा आतंकी और नरसंहारी देश करार देते हैं। वह कहते हैं की अमरिका एक ज़माने से दुसरे देश के नागरिको का नरसंहार करता रहा है और यह अभी भी बदस्तूर ज़ारी है। हालांकि चौमस्की किसी अंतरराष्ट्रीय नरसंहार न्यायलय के न्यायधीश नहीं है मगर अमरिका के वर्षों के सुदृड़ नरसंहारी रिकॉर्ड पर किसे शक हो सकता है। फिर यह कहाँ तक जायज़ है की एक जन्मजात नरसंहारी देश किसी दुसरे देश के राजनयिक की सांप्रदायिक नरसंहारीता में संग्लिप्त होने की सम्भावना के ऊपर अंपायरिंग करे।
यह हो सकता है की मोदीजी लोकसभा चुनाव से पहले अपने सैधांतिक गुरु अमरिका के पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज डब्लू बुश से दीक्षा ग्रहण के लिए अमरिका जाना चाहते हों। कई पहलुओं पर रिपब्लिकन पार्टी की अनुयायी रही भाजपा के लिए कुछ पश्चिमी समर्थक जुटाना चाहते हों या फिर अपने कार्यकाल के दौरान अमरिकी मॉडल पर हो रहे गुजरात के विकास के लिए तगमा लेना चाहते हों। कारण चाहे जो भी हो, बार बार दुत्कारे जाने के बाद भी मोदीजी की अमरिका जाने की उत्सुकता थोड़ी निराशाजनक प्रतित होती है।
जहाँ एक ओर मीडिया ने अदीब साहब के पहल के ऊपर कुछ सवाल उठाए तो वहीँ राजनितिक दलों नें इस मुद्दे से काफी हद तक कन्नी काट लीया। एक ओर कांग्रेस का कोई तार्किक बयान नहीं आया तो दूसरी ओर भाजपा ने राजनाथ सिंह को मोदीजी के "वीसानामो" के लिए अमरिका रवाना कर दिया और उनके वापसी तक के लिए हिन्दू राष्ट्रवाद की गाथा भुलाकर सिर्फ सांसदों के खिलाफ शिकायत दर्ज करना ही उचित समझा। कम्युनिस्ट पार्टी कॉपी और पेस्ट के दलील के साथ झेपती हुइ नज़र आई तो वहीं बिहारी अस्मिता की बात करने वाले नितीश कुमार ने राष्ट्रीय अस्मिता और जद(यू) सांसद साबिर अली के हस्ताक्षर के बारे में कुछ नहीं कहा।
इस वाद-विवाद में सांसदों के यादाश्त और उनके माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस के हुनरता के अवलोकन करने के अलावा कुछ अहम् सवाल भी किसी अनसुलझे गुत्थी की तरह रह गए जिस पर किसी ने चर्चा नहीं की। मसलन अदीब साहब और कई अन्य सांसदों के लिए अमरिका मानवाधिकार के पालन का मापदंड क्यों बन गया है, वो भी तब जब अमरिका का मानवाधिकार उल्लंघनो के मामलों में विश्व में कोई सानी नहीं है। क्यों हमारे राज्यतंत्र के नुमाइन्दो के लिए अमरिकी सरकार का मोदीजी को वीसा न देने का निर्णय एक तरह के सजा का प्रारूप है और सबसे महत्वपूर्ण यह की भाजपा और कांग्रेस दोनों को यह क्यों लगता है की उनके मोक्ष प्राप्ति के लिए भारत के सामाजिक और आर्थिक नीतियों का व्यापक अमरिकरण ज़रूरी है ?
इसमें कोई शक नहीं की अदीब साहब के मन में अमरिका को सांसारिक न्यायाधीश के रूप में देखने की चाहत हमारे ही समाज की देन हैं जहाँ हम बात-बात में अमरिका को पानी चढ़ाते रहते हैं। चाहे बात बेबाक बयान देने वाले विकास पुरुष मनमोहन सिंह की हो या फिर हँसी-ख़ुशी महंगाई का बोझ उठाए घूमते आम आदमी की, शायद सब समझने लगे हैं की अमरिका ही हमारा पालनहार है। टीवी चैंनलों पर किसी भी मुद्ददे पर हो रहे बहस को देख लीजिये, गाहे बगाहे अमरिका का जिक्र हो ही जाता है और हमारे बहुउपयोगी विशेषज्ञ अमरिकी निति को विश्वस्तरिय मापदंड कहने से कभी नहीं हिचकिचाते, भले ही कुछ अन्य देश उन मसलों पर अमरिका से कहीं ज्यादा बेहतर हों। लगता है की भारत में तबातोर बिकते अमरिका पुराण का अब कोई ओर-अंत नहीं रह गया है और मोदीजी के लिए तो अभी 3D प्रोजेक्शन ही सहारा है।

शाश्वत गौतम
२९ जुलाई, २०१३
वाशिंगटन डी.सी

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